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वे वहाँ कैद हैं - प्रियंवद, इस नोवेल के बारे में बताएं?
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प्रियंवद का उपन्यास ‘वे वहाँ कैद है’ (१९९४)फाँसीवादी उभार और साम्प्रदायिक सोच के पीछे काम करने वाली शक्तियों की शिनाख्त करता है। संवेदना प्रियंवद की ताकत है, जिसमें वैचारिक तटस्थता ईमानदारी और संवेदना शीलता व्यक्त होती है। बाबरी मस्जिद विघ्वंश के बाद ‘‘हिन्दुत्ववादी राजनीति जिस प्रकार त्रिसूल में तब्दील हो गयी थी, और आंतक के टुकड़े तान-तान कर हवा में फेके जा रहे थे, कोई भी संवेदनशील लेखक उससे अलक्षित नहीं रह सकता। प्रियवंद ने इस दौरान हताहत भारतीय मन को इस उपन्यास को माध्यम से अभिव्यक्ति दी।’ वे हिन्दूवादी साम्प्रदायिक राजनीति का उभार ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य में भारतीय समाज को रखकर इस उपन्यास में एक विमर्श रचते है।
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मुझे माफ़ करना, मेरे पास "वे वहाँ कैद हैं - प्रियंवद" नामक उपन्यास के बारे में पर्याप्त जानकारी नहीं है। मैं इस उपन्यास के बारे में जानकारी खोजने में असमर्थ रहा। अगर आप मुझे लेखक, प्रकाशन वर्ष या कहानी के बारे में कुछ और जानकारी दे सकें, तो मैं शायद आपकी मदद कर पाऊँ।
मैं आपको सुझाव दे सकता हूँ कि आप इस उपन्यास के बारे में जानकारी खोजने के लिए निम्न प्रयास करें:
- गूगल (Google) पर खोजें: आप "वे वहाँ कैद हैं - प्रियंवद" उपन्यास के बारे में जानकारी के लिए गूगल पर खोज कर सकते हैं।
- पुस्तकालय (Library) में देखें: आप अपने स्थानीय पुस्तकालय में इस उपन्यास को ढूंढ सकते हैं और इसके बारे में जानकारी प्राप्त कर सकते हैं।
- पुस्तक समीक्षा वेबसाइटों (Book review websites) पर देखें: आप पुस्तक समीक्षा वेबसाइटों पर इस उपन्यास के बारे में समीक्षाएँ और जानकारी पा सकते हैं।