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झूम कृषि किसे कहते हैं?
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झूम कृषि, जिसे 'स्थानांतरण कृषि' या 'काटो और जलाओ' कृषि भी कहा जाता है, एक प्राचीन कृषि प्रणाली है जो मुख्य रूप से पूर्वोत्तर भारत के आदिवासी समुदायों द्वारा की जाती है। इसमें जंगल के एक हिस्से को काटकर और जलाकर साफ किया जाता है, और फिर उस भूमि पर कुछ वर्षों तक फसलें उगाई जाती हैं। जब भूमि की उर्वरता कम हो जाती है, तो उसे छोड़ दिया जाता है और एक नए क्षेत्र में यही प्रक्रिया दोहराई जाती है।
झूम कृषि की प्रक्रिया:
- जंगल की कटाई: सबसे पहले, जंगल के एक हिस्से के पेड़ों और वनस्पतियों को काट दिया जाता है।
- जलाना: कटे हुए पेड़ों और वनस्पतियों को सुखाकर जला दिया जाता है। जली हुई राख मिट्टी में मिल जाती है, जिससे मिट्टी को कुछ पोषक तत्व मिलते हैं।
- बुवाई: राख युक्त मिट्टी में बीज बोए जाते हैं। आमतौर पर, विभिन्न प्रकार की फसलें एक साथ उगाई जाती हैं, जैसे कि धान, मक्का, सब्जियां और दालें।
- फसल कटाई: कुछ वर्षों तक फसलें उगाने के बाद, जब मिट्टी की उर्वरता कम हो जाती है, तो उस भूमि को छोड़ दिया जाता है।
- नए क्षेत्र की खोज: किसान एक नए जंगल के क्षेत्र में जाते हैं और वहां फिर से वही प्रक्रिया दोहराते हैं।
झूम कृषि के प्रभाव:
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सकारात्मक प्रभाव:
- यह आदिवासी समुदायों के लिए भोजन और आजीविका का स्रोत है।
- यह जैव विविधता को बढ़ावा दे सकता है, क्योंकि विभिन्न प्रकार की फसलें उगाई जाती हैं।
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नकारात्मक प्रभाव:
- वनों की कटाई: झूम कृषि के कारण वनों की कटाई होती है, जिससे पर्यावरण को नुकसान होता है।
- मिट्टी का कटाव: भूमि को बार-बार जलाने और साफ करने से मिट्टी का कटाव होता है, जिससे भूमि की उर्वरता कम हो जाती है।
- जैव विविधता का नुकसान: वनों की कटाई और आग लगने से जैव विविधता का नुकसान होता है।
झूम कृषि एक जटिल कृषि प्रणाली है जिसके सकारात्मक और नकारात्मक दोनों प्रभाव हैं। वर्तमान में, झूम कृषि के टिकाऊ विकल्पों की तलाश की जा रही है ताकि पर्यावरण को नुकसान कम हो और आदिवासी समुदायों की आजीविका भी बनी रहे।
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