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झूम कृषि कहते हैं?
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झूम कृषि, जिसे 'स्थानांतरण कृषि' भी कहा जाता है, एक प्रकार की आदिम कृषि पद्धति है जो मुख्य रूप से भारत के पूर्वोत्तर राज्यों और अन्य उष्णकटिबंधीय क्षेत्रों में प्रचलित है। इसमें जंगल के एक हिस्से को काटकर और जलाकर साफ किया जाता है, और फिर उस भूमि पर कुछ वर्षों तक फसलें उगाई जाती हैं। जब मिट्टी की उर्वरता कम हो जाती है, तो उस जगह को छोड़ दिया जाता है और जंगल को फिर से बढ़ने दिया जाता है, जबकि किसान एक नए क्षेत्र में चला जाता है।
झूम कृषि की प्रक्रिया:
- वनस्पति को काटना: सबसे पहले, जंगल या वनस्पति के एक हिस्से को काट दिया जाता है।
- जलाना: काटे गए वनस्पति को सुखाकर जला दिया जाता है। राख में मौजूद पोषक तत्व मिट्टी में मिल जाते हैं, जिससे मिट्टी की उर्वरता बढ़ जाती है।
- खेती: साफ की गई भूमि पर कुछ वर्षों (आमतौर पर 2-3 साल) तक फसलें उगाई जाती हैं।
- स्थानांतरण: जब मिट्टी की उर्वरता कम हो जाती है, तो उस भूमि को छोड़ दिया जाता है और किसान एक नए क्षेत्र में चला जाता है, जहाँ वे उसी प्रक्रिया को दोहराते हैं।
झूम कृषि के प्रभाव:
- सकारात्मक प्रभाव: यह प्रणाली पारंपरिक रूप से समुदायों की खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित करने में मदद करती है। जली हुई वनस्पति की राख मिट्टी को उपजाऊ बनाती है।
- नकारात्मक प्रभाव: वनोन्मूलन, मिट्टी का क्षरण, और जैव विविधता का नुकसान इसके कुछ नकारात्मक प्रभाव हैं। बार-बार झूम कृषि करने से मिट्टी की उर्वरता कम हो जाती है और पर्यावरण को नुकसान पहुँचता है।
झूम कृषि एक जटिल प्रणाली है जिसके अपने फायदे और नुकसान हैं। टिकाऊ कृषि पद्धतियों को बढ़ावा देकर इसके नकारात्मक प्रभावों को कम किया जा सकता है।
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